मुद्रास्फीति (महंगाई): परिभाषा, कारण और नियंत्रण के उपाय
महंगाई या मुद्रास्फीति भारत की एक प्रमुख आर्थिक समस्या है जो आम जनता के जीवन को गहराई से प्रभावित करती है। अक्टूबर 2025 की स्थिति के अनुसार, भारत में महंगाई दर 2.07% के स्तर पर है, जो RBI के लक्ष्य के अनुकूल है। इस रिपोर्ट में मुद्रास्फीति की व्यापक समझ, इसके कारण, प्रभाव और नियंत्रण के उपायों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया गया है।
मुद्रास्फीति की परिभाषा और अर्थ
मुद्रास्फीति का सरल अर्थ है समय के साथ वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में निरंतर वृद्धि। जब महंगाई बढ़ती है, तो आपके पास मौजूद पैसे की क्रय शक्ति (purchasing power) कम हो जाती है। उदाहरण के लिए, यदि कल आप 100 रुपए में एक किलो चावल खरीद सकते थे, तो आज उसी चावल के लिए 110 रुपए देने पड़ सकते हैं।
महंगाई की माप मुद्रास्फीति दर से की जाती है, जो एक वर्ष से दूसरे वर्ष के बीच मूल्य वृद्धि का प्रतिशत दर्शाती है। भारत में मुख्यतः दो सूचकांकों से इसकी गणना होती है:
यह आम आदमी की रोजाना की जरूरतों की कीमतों को मापता है। इसमें दूध, सब्जी, पेट्रोल, स्कूल फीस, किराया आदि शामिल होते हैं। सरकार इन सभी चीजों की एक बास्केट बनाती है और हर महीने देखती है कि इस बास्केट का कुल मूल्य कितना बढ़ा है।
यह औद्योगिक स्तर पर कच्चे माल जैसे कच्चा तेल, सीमेंट, धातुओं की कीमतों को मापता है। यह उत्पादकों और व्यापारियों के लिए अधिक महत्वपूर्ण है।
भारत में महंगाई दर - 2025 के महीनों का ट्रेंड1. मांग-आधारित मुद्रास्फीति (Demand-Pull Inflation)
जब बाजार में वस्तुओं और सेवاओं की मांग उनकी आपूर्ति से अधिक हो जाती है, तो कीमतें बढ़ जाती हैं। यह स्थिति तब उत्पन्न होती है जब:
· लोगों की आय बढ़ने से खरीदारी बढ़ जाती है
· सरकारी खर्च अधिक हो जाता है
· निर्यात की मांग बढ़ जाती है
2. लागत-आधारित मुद्रास्फीति (Cost-Push Inflation)
जब उत्पादन की लागत बढ़ जाती है तो कंपनियां अपने उत्पादों की कीमतें बढ़ा देती हैं। इसके मुख्य कारण हैं:
· कच्चे माल की कीमतों में वृद्धि
· मजदूरी में वृद्धि
· पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतें
· करों में वृद्धि
जब बाजार में पैसे की मात्रा आवश्यकता से अधिक हो जाती है, तो महंगाई बढ़ती है। यह तब होता है जब:
· सरकार अधिक नोट छापती है
· बैंक अधिक ऋण देते हैं
· घाटे के बजट से नई मुद्रा का सृजन होता है
4. भारत में महंगाई के विशिष्ट कारण
खाद्य मुद्रास्फीति: भारत में खाद्य वस्तुओं का CPI में 45.86% हिस्सा है। मानसून की अनिश्चितता, कृषि लागत में वृद्धि, और परिवहन की समस्याओं से खाद्य कीमतें प्रभावित होती हैं।
ईंधन आयात निर्भरता: भारत अपनी ईंधन जरूरतों का 80% आयात करता है। कच्चे तेल की कीमत में $10 की वृद्धि से भारत में महंगाई 40-60 बेसिस पॉइंट बढ़ जाती है।
भू-राजनीतिक संघर्ष: रूस-यूक्रेन युद्ध और इजरायल-हमास संघर्ष जैसी घटनाओं से कच्चे तेल और खाद्य वस्तुओं की कीमतें प्रभावित होती हैं।
· क्रय शक्ति में कमी: वही पैसे में कम सामान मिलता है
· जीवन स्तर में गिरावट: विशेषकर गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों पर अधिक प्रभाव
· बचत की वास्तविक वैल्यू में कमी: पैसे की वैल्यू घटने से बचत कम हो जाती है
· उत्पादन लागत में वृद्धि: कच्चे माल और मजदूरी की बढ़ती लागत
· निवेश में अनिश्चितता: भविष्य की योजना बनाना कठिन हो जाता है
· अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में कमी: भारतीय वस्तुएं महंगी हो जाती हैं
· मुद्रा का अवमूल्यन: रुपए की वैल्यू घटती है
· ब्याज दरों में वृद्धि: RBI महंगाई नियंत्रण के लिए दरें बढ़ाता है
· सामाजिक-राजनीतिक परिणाम: जनता में असंतोष और प्रदर्शन
मौद्रिक नीति के उपाय (RBI द्वारा)
रिपो रेट में वृद्धि: RBI जब रिपो रेट बढ़ाता है तो बैंकों के लिए पैसा उधार लेना महंगा हो जाता है। इससे बैंक भी ऋण की दरें बढ़ा देते हैं, जिससे लोग कम खर्च करते हैं और महंगाई कम होती है।
कैश रिजर्व रेशियो (CRR) में वृद्धि: बैंकों को RBI के पास अधिक पैसा जमा करना पड़ता है, जिससे बाजार में पैसे की मात्रा कम हो जाती है।
स्टेट्यूटरी लिक्विडिटी रेशियो (SLR) में वृद्धि: बैंकों को अधिक तरल संपत्ति रखनी पड़ती है।
ओपन मार्केट ऑपरेशन: RBI सरकारी प्रतिभूतियां बेचकर बाजार से पैसा वापस लेता है।
राजकोषीय नीति के उपाय (सरकार द्वारा)
करों में वृद्धि: आयकर और वस्तु कर बढ़ाने से लोगों की खर्च करने की क्षमता कम हो जाती है।
सरकारी खर्च में कमी: अनावश्यक खर्च घटाने से मांग कम होती है।
अतिरिक्त बजट (Surplus Budget): सरकार को अधिक कमाई और कम खर्च करना चाहिए।
सार्वजनिक ऋण की रणनीति: नया ऋण लेकर बाजार से पैसा वापस लेना।
निर्यात नीति: आवश्यक वस्तुओं के निर्यात पर रोक या न्यूनतम निर्यात मूल्य (MIP) लगाना।
मूल्य नियंत्रण नीति: आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 के तहत वस्तुओं को आवश्यक घोषित करना।
जमाखोरी और सट्टेबाजी विरोधी नीति: कालाबाजारी रोकथाम और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति अधिनियम 1980 के तहत कार्रवाई।
भारत में मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (Inflation Targeting)
2016 में RBI ने लचीली मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (Flexible Inflation Targeting) अपनाई। इसकी मुख्य विशेषताएं हैं:
· लक्ष्य दर: 4% वार्षिक मुद्रास्फीति
· सहनशीलता सीमा: +/- 2% (यानी 2% से 6% के बीच स्वीकार्य)
· समीक्षा: हर 5 साल में केंद्र सरकार और RBI मिलकर लक्ष्य तय करते हैं
· मापदंड: उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) को मुख्य संकेतक माना गया है
अगस्त 2025 में भारत की मुद्रास्फीति दर 2.07% थी, जो जुलाई 2025 के 1.55% से बढ़ी है। यह RBI के लक्ष्य बैंड के अंतर्गत है और स्वस्थ स्तर को दर्शाती है।
खाद्य मूल्य अस्थिरता: भारत के CPI में खाद्य और तेल का लगभग 50% हिस्सा है। RBI का इन कीमतों पर सीधा नियंत्रण नहीं है क्योंकि ये प्राकृतिक कारकों और वैश्विक अनिश्चितताओं से प्रभावित होती हैं।
आपूर्ति झटकों का समाधान: सरकार की निकासी नीतियां (जैसे गेहूं, चावल, प्याज का निर्यात प्रतिबंध) कभी-कभी घरेलू बाजार में डर और घबराहट पैदा करती हैं।
मौद्रिक नीति की सीमाएं: RBI की मौद्रिक नीति केवल मांग को नियंत्रित करती है। यह खाद्य और तेल से उत्पन्न आपूर्ति झटकों से निपटने में सीमित है।
मुद्रास्फीति एक जटिल आर्थिक समस्या है जिसके लिए एक समन्वित दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है। भारत में इसे नियंत्रित करने के लिए RBI की मौद्रिक नीति और सरकार की राजकोषीय नीति दोनों का प्रभावी उपयोग आवश्यक है।
मुख्य सिफारिशें:
· कृषि उत्पादकता बढ़ाने में निवेश करना
· बेहतर परिवहन और भंडारण व्यवस्था विकसित करना
· ईंधन आयात निर्भरता कम करने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देना
· आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत बनाना
· समन्वित मौद्रिक और राजकोषीय नीति का क्रियान्वयन
वर्तमान में भारत की महंगाई दर स्वस्थ स्तर पर है, लेकिन निरंतर
निगरानी और प्रभावी नीति निर्माण की आवश्यकता बनी रहती है। केवल मौद्रिक नीति पर निर्भर
न रहकर संरचनात्मक सुधारों पर भी ध्यान देना जरूरी है ताकि दीर्घकालिक मूल्य स्थिरता
सुनिश्चित की जा सके।
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